मन में लाखों उलझन थी। दिल में खासा शोर था। ये बात उन दिनों की है यारो। जब प्रेम-पत्र का दौर था। सबके छुपकर तन्हाई में। खत हम लिखा करते थे। अक्सर खत के पन्नों में। एक-दूजे के चेहरे दिखते थे।
कदम-कदम पर पहरे थे। डरते थे घबराते थे। हिम्मत कर के छूप-छूप कर। एक-दूजे को पत्र पहुँचाते थे। दिल का हाल एक दूजे को। हम लफ्जों में समझते थे। कितनी दिल में चाहत है। लिख कर के बतलाते थे।
फुर्सत के फिर लम्हों में। जब पत्र पढ़े वो जाते थे। धड़कन दिल की बढ़ जाती थी। हम मंद-मंद मुस्काते थे। वो पत्र कभी देते थे खुशी। हमको बहुत हँसाते थे। कभी वो गम दे कर के। हमको खूब रुलाते थे।
अपनों की खुशी की खातिर जब। हम अपना प्रेम भुलाते थे। आँखें भी नम हो जाती थी। जब एक-एक कर पत्र जलाते थे। वो अंतिम प्रेम-पत्र जिसमे। एक-दूजे को हिदायत लिखते थे। वापस लेकर कसमे वादें। किस्मत से शिकायत लिखते थे।
जब लिखते थे एक-दूजे से। ये अंतिम-पत्र हमारा है। एक दूजे को हम भुला देंगे। नहीं मुमकिन साथ हमारा है। वो खेल दिलों के होते थे। दिल पर किसका जोर था। ये बात उन दिनों की है यारो। जब प्रेम-पत्र का दौर था।

ー Priyank Sharma.