क्या सुकून था जीने में। ना दिल में दर्द छुपाते थे। वो रातें भी क्या रातें थी। बस दो पल में सो जाते थे। मासूमी चेहरे पर थी। हम खुलकर बातें करते थे। नादानी थी फितरत में। गलती करने से डरते थे। बचकानी सी बातों को हम। बार-बार दोहराते थे। वो रातें भी क्या रातें थी। बस दो पल में सो जाते थे।
हमको हर एक गलती की। झट से माफ़ी मिल जाती थी। बस झूठों को रोना था। और ज़िद्द पूरी हो जाती थी। हम सबको प्यारे लगते थे। सब हमसे लाड लड़ाते थे। वो रातें भी क्या रातें थी। बस दो पल में सो जाते थे। बेफिक्र से रहते थे। हम बड़ी शरारत करते थे। मम्मी-पापा ही दुनिया थी। उनको खोने से डरते थे।
चोट कभी जो लगती थी। जमकर आसूं बहाते थे। वो रातें भी क्या रातें थी। बस दो पल में सो जाते थे। ना बीते कल का रोना था। ना आने वाले की फ़िक्र कोई। बस होता है अब बातों में। अपने बचपन का जिर्क वही। खुद से भारी बस्ता लेकर। जब हम पढ़ने जाते थे। वो रातें भी क्या रातें थी। बस दो पल में सो जाते थे।

ー Priyank Sharma.